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ब्रम्हचर्य क्या है? (What is Brahmacharya?)


ब्रम्हचर्य क्या है? (What is Brahmacharya?):
आइये ब्रम्हचर्य क्या है, ब्रम्हचर्य का पालन क्यों एवं कैसे करना चाहिए तथा आयुर्वेद से इसका क्या सम्बन्ध है...?
ब्रम्हचर्य एक ऐसी शक्ति है हमे अमर, शक्स्तिशाली, समृद्ध, रोगमुक्त , मजबूत बनाता है, आइए हम आपको बताता हु की ब्रम्हचर्य वास्तव में क्या है, हम जानते है की दुनिआ में कुछ ऐसी व्यधि है जो मनुष्य के सरीर मन एवं समाज के वातावरण से उत्त्पन्न होती है जो मुख्यतया 6 प्रकार की होती है।
  1. काम
  2. क्रोध 
  3. लोभ 
  4. मोह 
  5. लालच 
  6. ईर्ष्या /द्वेष 
इन छह कर्मो का त्याग करने वाला पुरुष/स्त्री को ब्रम्हचर्य का पालन करना कहा जाता है।
जबकि चरक संहिता में आचार्य चरक मुनि ने कहा है की ब्रम्हचर्य उन सभी चीजों का त्याग करना होता है, जिसको करने से किसी जीव मानव को कष्ट होता हो अर्थात हमे उन सभी चीजों का तयाग कर देना चाहिए जिससे किसी जीव जंतु या मानव का मृत्यु/दर्द  होता हो। जैसे अनाज खाने से उस दाने में एक जीव होता है तो हमे उसका त्याग कर देना चाहिए वास्तव में फलाहार ही एक मात्र ऐसा भोजन होता है जिससे उनके अंदर प्राप्त बीज (गुठली) मुक्त हो जाती है जो एक पुण्य का कार्य होता है, हरे बृक्ष इत्यादि की वस्तुओ का त्याग कर देना चाहिए, बहुत से ऐसे वस्तुए जिनका निर्माण दर्द देकर तैयार किया जाता है उन सभी चीजों का त्याग कर देना चाहिए जिनसे मन आत्मा शक्ति उत्पन्न होती है। जबकि कलयुग में ऐसा होना असंभव है, तो आज के समय में अगर हम ऊपर लिखे चार ब्याधिओ का ही त्याग कर ले तो हमारा ब्रम्हचर्य पूर्ण माना जाता है। तथा ऐसे कार्य का समागम करना चाहिए जिससे किसी को ख़ुशी प्राप्त हो, जैसे:
  • समाज सेवा / राष्ट्र सेवा। 
  • जन सेवा / मानव सेवा। 
  • किसी के दुःख दर्द में मदद करना। 
  • किसी को दर्द या कष्ट न होने देना। 
  • किसी को कटु वचन या ब्यंग न बोलना। 
  • कही-कही पर ब्यंग भी बोलना जरुरी होता है जैसा कोई दुश्टता या गलत करे जिससे उनके प्रकृति में परिवर्तन हो, अगर उनके प्रकृति में परिवर्तन नहीं होता है तो ऐसे लोग से दूर हो जाना चाहिए। 

ब्रह्मचर्य पर आधुनिक विचार:
चुकी कई विद्वानों का कहना है कि विवाह न करना ब्रम्हचर्य होता है, जबकि ऐसा नहीं है अगर आप सादी सुधा है तो भी आप ब्रम्हचर्य का पालन कर सकते है, अर्थात ब्रम्हचर्य उन छह (काम, क्रोध, लोभ, मोह, लालच, ईर्ष्या/द्वेष) कर्मो का त्याग करना मात्र है।  

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